By - Gurumantra Civil Class
At - 2025-12-24 11:37:38
“चुनावी सुधार या मताधिकार पर खतरा? : SIR की पड़ताल”
संभावित प्रश्न मुख्य परीक्षा के लिए -
1. "मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनावी सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए या सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर खतरा? इस बहस के पक्ष-विपक्ष में तर्क देते हुए चर्चा कीजिए।"(निबंध पेपर या GS Paper 2; 250 शब्दों में। यह प्रश्न बहसपूर्ण है और संवैधानिक मूल्यों पर केंद्रित।)
2. "भारतीय निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 324) के संदर्भ में SIR प्रक्रिया की वैधता का मूल्यांकन कीजिए। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख करें।"(GS Paper 2; 200 शब्दों में। Polity पर फोकस, न्यायिक समर्थन की आवश्यकता।)
3. "SIR प्रक्रिया से वंचित वर्गों (दलित, आदिवासी, प्रवासी मजदूर) पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। क्या यह समावेशी लोकतंत्र के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है? सुझाव दीजिए।" (GS Paper 1 या GS Paper 2; 250 शब्दों में। सामाजिक न्याय और समावेशिता पर जोर।)
4. "चुनाव आयोग द्वारा SIR की समयबद्धता और राजनीतिक दुरुपयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उपाय सुझाइए।" (GS Paper 2; 150 शब्दों में। सुधार-उन्मुख प्रश्न।)
5. "मोहिंदर सिंह गिल बनाम निर्वाचन आयोग तथा अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ के सुप्रीम कोर्ट निर्णयों के प्रकाश में SIR की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। क्या ये निर्णय आयोग की स्वायत्तता को मजबूत करते हैं?" (GS Paper 2; 200 शब्दों में। न्यायिक पहलुओं पर आधारित।)
6. "भारतीय लोकतंत्र में 'एक व्यक्ति, एक वोट' सिद्धांत की रक्षा हेतु SIR जैसी प्रक्रियाओं की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए, साथ ही इसके संभावित जोखिमों का उल्लेख करें।" (निबंध पेपर; 1000 शब्दों में। व्यापक बहस।)
7. "राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से SIR की प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवासियों की पहचान के संदर्भ में।" (GS Paper 3 - Internal Security; 150 शब्दों में। सुरक्षा और चुनाव का इंटरसेक्शन।)
8. "चुनाव आयोग से जुड़े विवादों (EVM-VVPAT, SIR टाइमिंग, आयुक्त नियुक्ति) के संदर्भ में, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए क्या सुधार आवश्यक हैं? तर्कसंगत विश्लेषण कीजिए।" (GS Paper 2; 250 शब्दों में। समसामयिक मुद्दों पर।)
भूमिका (Introduction)-
लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव उसकी आत्मा होते हैं। भारत में मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने हेतु Special Intensive Revision (SIR) जैसी प्रक्रियाएँ समय-समय पर अपनाई जाती रही हैं।
हालाँकि हाल के वर्षों में SIR को लेकर यह बहस तेज हुई है कि क्या यह चुनावी सुधार का साधन है या फिर मताधिकार को सीमित करने का संभावित माध्यम। यह प्रश्न भारतीय लोकतंत्र, संविधान और चुनाव आयोग की भूमिका के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
SIR (Special Intensive Revision) क्या है?
मतदाता सूची का विशेष, व्यापक और गहन पुनरीक्षण
उद्देश्य:
मृत मतदाताओं के नाम हटाना
दोहरे नाम (Duplicate Entries) समाप्त करना
स्थानांतरित मतदाताओं का अद्यतन
अपात्र/अवैध प्रविष्टियों को हटाना
यह प्रक्रिया Representation of the People Act, 1950 तथा Article 324 के अंतर्गत आती है।
भारत में चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति -
1. अनुच्छेद 324 – चुनावों के अध्यक्षता, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार
2. एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय
3. संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों का संचालन
4. चुनाव आयोग कोई सरकारी विभाग नहीं बल्कि संविधान से शक्ति प्राप्त संस्था है।
चुनाव आयोग की शक्तियाँ -
1. मतदाता सूची तैयार करना एवं संशोधन
2. आचार संहिता लागू करना
3. चुनाव कार्यक्रम घोषित करना
4. निर्वाचन अधिकारियों की नियुक्ति
5. चुनाव रद्द/स्थगित करने की अनुशंसा
सुप्रीम कोर्ट ने Mohinder Singh Gill vs Election Commission में स्पष्ट किया कि Article 324 आयोग को व्यापक अवशिष्ट शक्तियाँ देता है।
SIR : चुनावी सुधार के पक्ष में तर्क -
1. मतदाता सूची की शुद्धता-
फर्जी एवं मृत मतदाताओं की पहचान
चुनावी पारदर्शिता में वृद्धि
2. “One Person, One Vote” सिद्धांत की रक्षा-
लोकतंत्र की बुनियादी शर्त
अनुचित प्रभाव और धांधली पर रोक
3. राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क-
अवैध प्रवासियों की पहचान (विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में)
4. पूर्व न्यायिक समर्थन
Lakshmi Charan Sen vs A.K.M. Hassan Uzzaman
→ मतदाता सूची संशोधन को वैध प्रशासनिक प्रक्रिया माना गया
SIR : मताधिकार पर खतरे के तर्क -
1. वंचित वर्गों पर प्रतिकूल प्रभाव
गरीब, प्रवासी मजदूर
दलित, आदिवासी
शहरी झुग्गी निवासी
2. दस्तावेज़ आधारित अपवर्जन
पहचान/निवास प्रमाण की कठिन शर्तें
“Administrative Exclusion” की आशंका
3. राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना -
चुनाव से ठीक पहले SIR
विपक्षी मतदाताओं के नाम हटने का आरोप
संवैधानिक मूल्यों पर प्रभाव -
1. Article 326 के तहत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
2. Article 14 (समानता का अधिकार) का संभावित उल्लंघन
चुनाव आयोग से जुड़े प्रमुख विवाद -
1. SIR/डीलिमिटेशन की टाइमिंग
2. EVM-VVPAT विवाद
3. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया
हालिया संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:-
1. Anoop Baranwal vs Union of India
→ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में स्वतंत्र चयन समिति की आवश्यकता
यह निर्णय आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को मजबूत करता है।
सुधार एवं संतुलन के उपाय (Way Forward)
1. SIR के लिए स्पष्ट, पारदर्शी दिशा-निर्देश
2. पर्याप्त सूचना, समय और अपील का अधिकार
3. तकनीक + मानवीय सत्यापन का संतुलन
4. स्वतंत्र पर्यवेक्षण तंत्र
5. चुनाव से ठीक पहले SIR से परहेज़
6. नागरिक जागरूकता अभियान
निष्कर्ष (Conclusion)
SIR अपने आप में न तो लोकतंत्र का शत्रु है और न ही समाधान।
यह उद्देश्य, प्रक्रिया और क्रियान्वयन पर निर्भर करता है।
यदि यह संवैधानिक मूल्यों, समावेशिता और पारदर्शिता के साथ लागू हो, तो यह चुनावी सुधार का सशक्त साधन बन सकता है;
लेकिन यदि इसमें जल्दबाज़ी, अपारदर्शिता या राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ, तो यह मताधिकार पर गंभीर खतरा बन सकता है।
अतः आवश्यकता है कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करे।
विस्तारपूर्वक नोट्स -
लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव उसकी आत्मा होते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण और विशाल लोकतंत्र में, चुनाव प्रक्रिया की अखंडता सुनिश्चित करना एक जटिल चुनौती है। भारत में मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने हेतु Special Intensive Revision (SIR) जैसी प्रक्रियाएँ समय-समय पर अपनाई जाती रही हैं। SIR एक विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया है, जो मतदाता सूची से फर्जी, मृत या दोहरे नामों को हटाने का कार्य करती है। हालाँकि, हाल के वर्षों में SIR को लेकर यह बहस तेज हुई है कि क्या यह चुनावी सुधार का साधन है या फिर मताधिकार को सीमित करने का संभावित माध्यम। उदाहरणस्वरूप, 2024 के लोकसभा चुनावों से पूर्व SIR की समयबद्धता पर विपक्षी दलों ने आरोप लगाए कि यह विपक्षी मतदाताओं को वंचित करने का प्रयास है। यह प्रश्न भारतीय लोकतंत्र, संविधान और चुनाव आयोग की भूमिका के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल चुनावी पारदर्शिता को प्रभावित करता है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों जैसे समानता (अनुच्छेद 14) और सार्वभौमिक मताधिकार (अनुच्छेद 326) को भी चुनौती दे सकता है। इस पड़ताल का उद्देश्य SIR के दोहरे चरित्र को समझना है - सुधार के रूप में इसका सकारात्मक योगदान और दुरुपयोग की संभावना।
SIR (Special Intensive Revision) क्या है?
SIR मतदाता सूची का विशेष, व्यापक और गहन पुनरीक्षण है, जो सामान्य वार्षिक संशोधन से अधिक सख्त और व्यापक होता है। यह प्रक्रिया निर्वाचन आयोग द्वारा निर्देशित होती है और आमतौर पर चुनाव से 6-12 महीने पूर्व आरंभ की जाती है। इसका मुख्य फोकस मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध रखना है, ताकि चुनाव परिणाम विश्वसनीय हों।
उद्देश्य:
- **मृत मतदाताओं के नाम हटाना:** भारत में प्रति वर्ष लाखों मौतें होती हैं, लेकिन जन्म-मृत्यु पंजीकरण की कमजोरी के कारण नाम सूची में बने रहते हैं। SIR में स्थानीय अधिकारियों और पुलिस रिकॉर्ड्स के माध्यम से सत्यापन किया जाता है, जिससे फर्जी वोटिंग रोकी जाती है।
- **दोहरे नाम (Duplicate Entries) समाप्त करना:** एक व्यक्ति के कई नाम (जैसे नाम में वर्तनी भिन्नता या स्थानांतरण के कारण) सूची में आ जाते हैं। SIR में आधार, PAN या वोटर ID लिंकिंग से डुप्लिकेट हटाए जाते हैं, जो 2019 के चुनावों में 2 करोड़ से अधिक दोहरे नामों की पहचान में सहायक रहा।
- **स्थानांतरित मतदाताओं का अद्यतन:** प्रवासी मजदूरों या शहरीकरण के कारण लोग स्थान बदलते हैं। SIR में EPIC (Electoral Photo Identity Card) ट्रांसफर और नए पते का अपडेट सुनिश्चित होता है, जो लोकतंत्र की समावेशिता को मजबूत करता है।
- **अपात्र/अवैध प्रविष्टियों को हटाना:** अवैध प्रवासी या नाबालिगों के नाम हटाए जाते हैं। यह Representation of the People Act, 1950 (धारा 21-25) तथा Article 324 के अंतर्गत आती है, जो आयोग को मतदाता सूची प्रबंधन की व्यापक शक्ति प्रदान करता है। SIR की सफलता 2023 के बिहार SIR में देखी गई, जहां 5 लाख से अधिक अपात्र नाम हटाए गए।
भारत में चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति -
निर्वाचन आयोग (ECI) भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है।
1. **अनुच्छेद 324 – चुनावों के अध्यक्षता, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार:** यह अनुच्छेद ECI को सर्वोच्च शक्ति देता है, जिसमें मतदाता सूची तैयार करना, चुनाव कार्यक्रम घोषित करना और आचार संहिता लागू करना शामिल है। SIR जैसी प्रक्रियाएँ इसी के अंतर्गत आती हैं।
2. **एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय:** ECI संसद या कार्यपालिका के अधीन नहीं है; यह स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, जो लोकतंत्र की स्वायत्त संस्थागत संरचना को मजबूत करता है।
3. **संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों का संचालन:** ECI केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर चुनाव संचालित करता है, जिसमें 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं का प्रबंधन शामिल है।
4. **चुनाव आयोग कोई सरकारी विभाग नहीं बल्कि संविधान से शक्ति प्राप्त संस्था है:** यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि ECI को संसदीय कानूनों से अधिक संवैधानिक प्राथमिकता प्राप्त है, जो इसे राजनीतिक दबाव से मुक्त रखता है।
चुनाव आयोग की शक्तियाँ -
ECI की शक्तियाँ संवैधानिक और वैधानिक दोनों हैं, जो SIR को वैधता प्रदान करती हैं।
1. **मतदाता सूची तैयार करना एवं संशोधन:** Representation of the People Act, 1951 के तहत ECI सूची तैयार करता है; SIR इसका विस्तार है।
2. **आचार संहिता लागू करना:** चुनाव के दौरान नैतिक मानकों का पालन सुनिश्चित करता है।
3. **चुनाव कार्यक्रम घोषित करना:** तिथियों की घोषणा और स्थगन का अधिकार।
4. **निर्वाचन अधिकारियों की नियुक्ति:** बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) आदि की नियुक्ति।
5. **चुनाव रद्द/स्थगित करने की अनुशंसा:** अनियमितताओं पर त्वरित कार्रवाई।
सुप्रीम कोर्ट ने Mohinder Singh Gill vs Election Commission (1978) में स्पष्ट किया कि Article 324 आयोग को व्यापक अवशिष्ट शक्तियाँ देता है, अर्थात् जहां कानून मौन है, वहाँ ECI निर्णय ले सकता है। यह SIR की न्यायिक वैधता का आधार है।
SIR: चुनावी सुधार के पक्ष में तर्क -
SIR को सुधार के रूप में देखने वाले तर्क लोकतंत्र की मजबूती पर केंद्रित हैं।
1. **मतदाता सूची की शुद्धता:** फर्जी एवं मृत मतदाताओं की पहचान से चुनावी धांधली रुकती है। 2019 के चुनावों में SIR से 3 करोड़ फर्जी नाम हटे, जिससे परिणाम अधिक विश्वसनीय हुए। यह चुनावी पारदर्शिता में वृद्धि करता है।
2. **“One Person, One Vote” सिद्धांत की रक्षा:** यह लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है (अनुच्छेद 326)। SIR अनुचित प्रभाव (जैसे बूथ कैप्चरिंग) और धांधली पर रोक लगाता है, जिससे हर वोट का समान मूल्य सुनिश्चित होता है।
3. **राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क:** अवैध प्रवासियों की पहचान (विशेषकर असम, बंगाल जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में) राष्ट्रीय हितों की रक्षा करती है। NRC (National Register of Citizens) से प्रेरित SIR आतंकवाद या घुसपैठ से जुड़े जोखिमों को कम करता है।
4. **पूर्व न्यायिक समर्थन:** **Lakshmi Charan Sen vs A.K.M. Hassan Uzzaman (1985)** में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची संशोधन को वैध प्रशासनिक प्रक्रिया माना, जो SIR को मजबूत आधार देता है।
SIR: मताधिकार पर खतरे के तर्क -
SIR के आलोचक इसे वंचनकारी मानते हैं, जो लोकतंत्र की समावेशिता को कमजोर करता है।
1. **वंचित वर्गों पर प्रतिकूल प्रभाव:** गरीब, प्रवासी मजदूर (जैसे बिहार के मजदूर दिल्ली में), दलित, आदिवासी और शहरी झुग्गी निवासी दस्तावेजों की कमी से प्रभावित होते हैं। 2023 बिहार SIR में 1 लाख से अधिक आदिवासी नाम हटने के आरोप लगे।
2. **दस्तावेज़ आधारित अपवर्जन:** पहचान/निवास प्रमाण (आधार, राशन कार्ड) की कठिन शर्तें "Administrative Exclusion" पैदा करती हैं, जहां निर्दोष मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं। यह गरीबी और अशिक्षा को दंडित करने जैसा है।
3. **राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना:** चुनाव से ठीक पहले SIR (जैसे 2024 चुनाव से 3 महीने पूर्व) विपक्षी मतदाताओं के नाम हटने का आरोप लगाता है। भाजपा शासित राज्यों में अधिक सख्ती के उदाहरण विवादास्पद हैं।
संवैधानिक मूल्यों पर प्रभाव -
1. **Article 326 के तहत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार:** SIR यदि अपवर्जनकारी हो, तो यह 18 वर्ष से ऊपर सभी नागरिकों के मताधिकार को सीमित करता है।
2. **Article 14 (समानता का अधिकार) का संभावित उल्लंघन:** वंचित वर्गों पर असमान प्रभाव समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
चुनाव आयोग से जुड़े प्रमुख विवाद
1. SIR/डीलिमिटेशन की टाइमिंग: चुनाव पूर्व SIR को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप।
2. **EVM-VVPAT विवाद:** पारदर्शिता पर सवाल, जो SIR की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
3. **चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया:** कार्यपालिका प्रभुत्व का आरोप।
हालिया संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
1. Anoop Baranwal vs Union of India (2023):सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में स्वतंत्र चयन समिति (प्रधान न्यायाधीश, PM, विपक्ष नेता) की आवश्यकता बताई। यह निर्णय आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को मजबूत करता है, जो SIR जैसे निर्णयों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखेगा।
सुधार एवं संतुलन के उपाय -
SIR को प्रभावी बनाने के लिए निम्न उपाय आवश्यक हैं:
1. SIR के लिए स्पष्ट, पारदर्शी दिशा-निर्देश: ECI द्वारा मानक SOP जारी करें।
2. पर्याप्त सूचना, समय और अपील का अधिकार: 30-60 दिनों का नोटिस और ऑनलाइन अपील पोर्टल।
3. तकनीक + मानवीय सत्यापन का संतुलन: AI आधारित स्कैनिंग के साथ BLO सत्यापन।
4. स्वतंत्र पर्यवेक्षण तंत्र: सिविल सोसाइटी या न्यायिक समिति की निगरानी।
5. चुनाव से ठीक पहले SIR से परहेज़:- न्यूनतम 6 महीने पूर्व।
6. नागरिक जागरूकता अभियान:- SMS, सोशल मीडिया से जागरूकता, विशेषकर वंचित वर्गों के लिए।
अतः SIR अपने आप में न तो लोकतंत्र का शत्रु है और न ही समाधान। यह उद्देश्य, प्रक्रिया और क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। यदि यह संवैधानिक मूल्यों, समावेशिता और पारदर्शिता के साथ लागू हो, तो यह चुनावी सुधार का सशक्त साधन बन सकता है; लेकिन यदि इसमें जल्दबाज़ी, अपारदर्शिता या राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ, तो यह मताधिकार पर गंभीर खतरा बन सकता है। अतः आवश्यकता है कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करे। बिहार जैसे राज्यों में, जहां SIR का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, स्थानीय स्तर पर जागरूकता और सुधार महत्वपूर्ण हैं। अंततः, मजबूत लोकतंत्र के लिए SIR को सुधार का पुल बनाना होगा, न कि विभाजन रेखा।
SIR के न्यायिक निर्णयों पर विस्तार
Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया, जो भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए अपनाई जाती है, समय-समय पर न्यायिक विवादों का विषय बनी रही है। ये निर्णय मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 324 (ECI की शक्तियां), प्रतिनिधित्व जनता अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) की धारा 21(3), और मतदाता अधिकारों (अनुच्छेद 326) पर केंद्रित हैं। SIR पर सीधे केंद्रित निर्णय कम हैं, लेकिन ECI की अवशिष्ट शक्तियों, मतदाता सूची संशोधन, और स्वायत्तता से जुड़े लैंडमार्क निर्णय SIR की वैधता को प्रभावित करते हैं। नीचे प्रमुख निर्णयों का विस्तृत वर्णन दिया गया है, जिसमें पृष्ठभूमि, मुख्य तर्क, निर्णय, और SIR पर प्रभाव शामिल हैं। जानकारी 24 दिसंबर 2025 तक की स्थिति पर आधारित है, जिसमें 2025 के बिहार SIR से जुड़े ऑनगोइंग केस प्रमुख हैं।
1. मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Mohinder Singh Gill vs Chief Election Commissioner, 1978) -
यह लैंडमार्क निर्णय पंजाब विधानसभा चुनाव 1977 से जुड़ा था, जहां गिनती के दौरान हिंसा से मतपत्र नष्ट हो गए, और ECI ने पुनः मतदान का आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं ने ECI के इस फैसले को चुनौती दी, दावा करते हुए कि यह अनुच्छेद 324 के दायरे से बाहर है। यह केस SIR पर सीधे नहीं, लेकिन ECI की चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप की शक्तियों पर आधारभूत है।
मुख्य तर्क:
- याचिकाकर्ता: ECI का पुनः मतदान आदेश मनमाना और विधि-विरोधी था; चुनाव प्रक्रिया को न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता।
- **ECI:** अनुच्छेद 324 ECI को व्यापक अवशिष्ट (residual) शक्तियां प्रदान करता है, जहां कानून मौन हो, वहां स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़ की बेंच) ने ECI के पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 324 ECI को "सुपरिंटेंडेंट" शक्तियां देता है, जो न केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित हैं, बल्कि जहां रिक्तता हो, वहां आवश्यक कदम उठाने की अनुमति देता है। कोर्ट ने कहा, "चुनाव प्रक्रिया एक निरंतर प्रक्रिया है, और ECI को त्वरित, निष्पक्ष निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।" यह निर्णय ECI की स्वायत्तता का मजबूत आधार बना।
- SIR पर प्रभाव:- SIR जैसी प्रक्रियाओं को ECI की अवशिष्ट शक्तियों के तहत वैधता प्रदान करता है। 2025 के बिहार SIR केस में इस निर्णय का हवाला देकर ECI ने अपनी शक्ति का बचाव किया। यह सुनिश्चित करता है कि SIR को "प्रशासनिक आवश्यकता" माना जाए, लेकिन पारदर्शिता के साथ।
2. लक्ष्मी चरण सेन बनाम ए. के. एम. हसन उज्जमान (Lakshmi Charan Sen vs A.K.M. Hassan Uzzaman, 1985) :-
यह केस पश्चिम बंगाल में 1982 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची संशोधन से जुड़ा था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी कर सूची संशोधन रोका था, जिसे ECI ने चुनौती दी। केस मतदाता सूची में नाम जोड़ने/हटाने की प्रक्रिया की वैधता पर केंद्रित था।
मुख्य तर्क:
- **याचिकाकर्ता (हसन उज्जमान):** संशोधन प्रक्रिया मनमानी है, जो फर्जी नाम जोड़ने का माध्यम बनेगी; यह स्वतंत्र चुनाव को प्रभावित करेगी।
- **ECI:** मतदाता सूची संशोधन एक वैध प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो प्रतिनिधित्व जनता अधिनियम की धारा 21 और 22 के तहत आती है। यह "बेसिक रोल" की शुद्धता सुनिश्चित करती है, जो निष्पक्ष चुनाव की आधारशिला है।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति ए. एन. सेन की बेंच) ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर ECI के पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि "मतदाता सूची चुनाव की बुनियाद है, और इसका संशोधन ECI का विशेषाधिकार है। नाम हटाना या जोड़ना विधि-सम्मत होना चाहिए, लेकिन न्यायालय हस्तक्षेप केवल असाधारण परिस्थितियों में करें।" कोर्ट ने जोर दिया कि संशोधन "फ्री एंड फेयर इलेक्शन" के लिए आवश्यक है, लेकिन दुरुपयोग रोकने के लिए दिशानिर्देश आवश्यक।
- SIR पर प्रभाव: SIR को "विशेष गहन संशोधन" के रूप में वैध प्रशासनिक प्रक्रिया माना गया। यह निर्णय 2025 के बिहार SIR में उद्धृत हुआ, जहां लाखों नाम हटाए गए, और कोर्ट ने शुद्धता की आवश्यकता को स्वीकार किया, लेकिन अपील के अधिकार पर जोर दिया।
3. अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (Anoop Baranwal vs Union of India, 2023)
- यह PIL ECI आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर था, जहां कार्यपालिका (केंद्रीय सरकार) का प्रभुत्व होने का आरोप था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह ECI की स्वायत्तता को कमजोर करता है।
मुख्य तर्क:
- याचिकाकर्ता: वर्तमान प्रक्रिया (केवल केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश) अनुच्छेद 324 का उल्लंघन करती है, जो स्वतंत्र ECI सुनिश्चित करती है।
- **सरकार/ECI:** प्रक्रिया संवैधानिक है, और हस्तक्षेप अनावश्यक।
निर्णय:-सुप्रीम कोर्ट (5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच, मुख्य न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़) ने अंतरिम आदेश जारी कर ECI सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र समिति (प्रधान न्यायाधीश, प्रधानमंत्री, विपक्ष नेता) गठित की। कोर्ट ने कहा कि "ECI की स्वायत्तता न केवल नियुक्ति के बाद, बल्कि प्रक्रिया में भी सुरक्षित होनी चाहिए।" यह निर्णय 2024-25 के चुनावों में लागू हुआ।
- **SIR पर प्रभाव:** अप्रत्यक्ष रूप से SIR जैसी नीतियों को प्रभावित करता है, क्योंकि स्वतंत्र ECI राजनीतिक दुरुपयोग रोकती है। 2025 बिहार SIR में विपक्ष ने आरोप लगाया कि ECI पक्षपाती है; यह निर्णय ECI की निष्पक्षता को मजबूत करता है, जिससे SIR की समयबद्धता पर सवाल उठते हैं।
4. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम निर्वाचन आयोग (Association for Democratic Reforms v. Election Commission of India, WP (C) 640/2025) – बिहार SIR केस (ऑनगोइंग, 2025):-
जून 2025 में ECI ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले SIR घोषित किया, जिसमें सभी मतदाताओं को फॉर्म भरने और 11 विशिष्ट दस्तावेज (जैसे जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल सर्टिफिकेट; आधार/राशन कार्ड को छोड़कर) जमा करने की आवश्यकता थी। 25 जुलाई 2025 तक डेडलाइन। परिणामस्वरूप 65 लाख से अधिक नाम डिलीट हुए। विपक्ष (इंडिया ब्लॉक) ने आरोप लगाया कि यह NDA को लाभ पहुंचाने वाला अपवर्जन है, विशेषकर गरीब, प्रवासी (75 लाख अंतरराज्यीय प्रवासी), दलित-आदिवासी वर्गों को प्रभावित। ECI ने कहा कि 20 वर्षों से गहन संशोधन न होने से सूची में त्रुटियां थीं।
- मुख्य तर्क:
- याचिकाकर्ता (ADR सहित): SIR मनमाना, लाखों को वंचित करने वाला; दस्तावेज मांग नागरिकता परीक्षा जैसी; अनुच्छेद 14 (समानता) और 326 (सार्वभौमिक मताधिकार) का उल्लंघन। लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (1995) का हवाला देकर कहा कि पात्रता की धारणा से संशोधन नहीं हो सकता।
- **ECI:** अनुच्छेद 324 और RoP Act की धारा 21(3) के तहत वैध; शहरीकरण, मृत/दोहरे नाम हटाने की आवश्यकता। डुप्लिकेट सॉफ्टवेयर असफल होने पर SIR जरूरी।
- मुख्य हियरिंग तिथियां और आदेश:-
- 10 जुलाई 2025: कोर्ट ने ECI को आधार, राशन कार्ड, EPIC को दस्तावेज मानने की सलाह दी।
- 14 अगस्त 2025: इंटरिम ऑर्डर (न्यायमूर्ति सूर्य कांत और जोयमलया बागची की बेंच) – 65 लाख डिलीटेड मतदाताओं की जिला-वार, बूथ-स्तरीय सूची (कारण सहित) 19 अगस्त तक प्रकाशित; ऑनलाइन/ऑफिस पर प्रदर्शित; आधार/EPIC से आपत्ति स्वीकार। राजनीतिक दलों को BLO एजेंट नियुक्त करने का निर्देश।
- 22 अगस्त 2025: ऑनलाइन/फिजिकल क्लेम सबमिशन की अनुमति; अगली सुनवाई 8 सितंबर।
- 27 नवंबर 2025:कोर्ट ने ECI की SIR शक्ति पर चुनौतियों को खारिज किया, लेकिन पारदर्शिता पर जोर।
-8 दिसंबर 2025: हियरिंग शुरू; आधार को पहचान प्रमाण मानने का आदेश। BLOs पर दबाव (35-40 की मौतें, FIRs) पर चर्चा; राज्यों को अतिरिक्त स्टाफ देने का निर्देश।
- 16 दिसंबर 2025: अखबार रिपोर्ट (केंद्रीकृत मास नोटिस) पर ECI से जवाब न मांगने का फैसला; कोर्ट ने कहा कि बिना प्रमाण के हस्तक्षेप नहीं।
- 18 दिसंबर 2025: हियरिंग जारी; ECI को 31 दिसंबर तक निर्णय लेने का निर्देश। कोर्ट ने कहा, "यदि SIR वैध है, तो इसे पूरा करें, लेकिन अपील सुनिश्चित करें।"
- वर्तमान स्थिति (24 दिसंबर 2025):** केस पेंडिंग; फाइनल निर्णय लंबित। ECI ने 17 अगस्त को डिलीटेड लिस्ट प्रकाशित की। दूसरा चरण 9 राज्यों/UTs में चल रहा।
SIR पर प्रभाव: यह केस SIR की संवैधानिकता पर सीधा परीक्षण है। कोर्ट ने ECI की शक्ति बरकरार रखी, लेकिन ट्रांसपेरेंसी (सूची प्रकाशन, अपील) और समावेशिता (आधार शामिल) पर सख्ती की। इससे भविष्य के SIR में वंचित वर्गों की रक्षा सुनिश्चित हुई, लेकिन राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप बने रहेंगे।
अतः ये निर्णय SIR को ECI की वैध शक्ति के रूप में स्थापित करते हैं, लेकिन पारदर्शिता, अपील अधिकार, और समावेशिता पर जोर देते हैं। 1978-1985 के निर्णय आधारभूत हैं, जबकि 2023 का अनूप बरनवाल ECI की स्वायत्तता मजबूत करता है। 2025 का बिहार केस समसामयिक है, जो दर्शाता है कि SIR सुधार का साधन हो सकता है, लेकिन दुरुपयोग से मताधिकार खतरे में पड़ सकता है। भविष्य में, RoP Act में संशोधन से संतुलन संभव है।
By - Gurumantra Civil Class
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