BPSC AEDO & Bihar SI Full Test Discussion Start from 3rd November 2025 . Total Set Discussion- 50+50. BPSC 72nd, UPPSC 2026, MPPSC 2026, Mains Cum Pt Batch Start from 10 November 2025

BPSC 71st Mains Answer Writing, Bihar Special-1

By - Gurumantra Civil Class

At - 2025-12-24 09:10:31

BPSC मेन्स हेतु संभावित प्रश्न (टॉपिक-वाइज)

वर्णनात्मक / विश्लेषणात्मक प्रश्न

1. “बिहार में बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा से अधिक मानव-निर्मित संकट बन चुकी है।” विश्लेषण कीजिए।

2. बिहार के बाढ़ संकट में तटबंध नीति की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

3. उत्तरी बिहार की नदियों की भौगोलिक संरचना बाढ़ को कैसे अपरिहार्य बनाती है?

4. बिहार में बाढ़ एवं सूखे की सह-अस्तित्व (Flood–Drought Paradox) की व्याख्या कीजिए।

5. नेपाल-बिहार सहयोग के अभाव में बाढ़ नियंत्रण क्यों असफल रहा है?

6. बाढ़ प्रबंधन में इकोलॉजिकल अप्रोच की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

7. बिहार में बाढ़ से कृषि, पलायन एवं गरीबी पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।

समसामयिक / सरकार की योजना आधारित प्रश्न

1. बिहार में बाढ़ प्रबंधन हेतु हालिया सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन कीजिए।

2. आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) बिहार में कितनी प्रभावी है?

3. NDMA के दिशा-निर्देश बिहार की बाढ़ समस्या के समाधान में कितने सहायक हैं?

4. बाढ़-सूखा प्रबंधन में जल संसाधन विभाग, बिहार की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

 

लेखनाभ्यास हेतु नोट्स (Answer Enrichment Notes)

 1. बिहार में बाढ़-सूखा : एक विरोधाभासी यथार्थ

बिहार का लगभग 73% क्षेत्र बाढ़-संभावित, वहीं

दक्षिण बिहार के कई भाग सूखा-प्रवण

  • कारण:

मानसून की स्थानिक-कालिक असमानता

जल संरक्षण का अभाव

सतही जल का अपव्यय और भू-जल का अतिदोहन

👉 इसे “Hydrological Paradox of Bihar” कहा जाता है (उत्तर में प्रयोग योग्य टर्म)

 2. बाढ़ के कारण : समकालीन विश्लेषण (Value Addition)

(क) प्राकृतिक कारण

  • हिमालयी युवा पर्वत → अधिक अपरदन
  • नदियों में अत्यधिक गाद (High Sediment Load)
  • गंगा बेसिन की कटोरानुमा संरचना

(ख) मानवजनित कारण

  • अवैज्ञानिक तटबंध नीति
  • बाढ़ मैदानों में बसावट
  • नेपाल में वनीकरण का अभाव
  • नदी जोड़ योजनाओं का धीमा क्रियान्वयन

3. तटबंध नीति : आँकड़ों के साथ आलोचना

  • 1954 :

तटबंध = 160 किमी

बाढ़ क्षेत्र = 25 लाख हे.

  • वर्तमान :

तटबंध = 3430 किमी

बाढ़ क्षेत्र = 68 लाख हे.

👉 निष्कर्ष:

“तटबंधों ने बाढ़ को नियंत्रित नहीं किया, बल्कि बाढ़ की प्रकृति को बदल दिया।”

4. बिहार में बाढ़ प्रबंधन : सरकार के नए प्रयास (Updated Content)

 (A) संस्थागत एवं नीतिगत पहल-

  1. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
  2. Flood Management Guidelines (Revised)
  3. राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, बिहार (BSDMA)
  4. Flood Preparedness Plan
  5. बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली (EWS)
  6. CWC + IMD आधारित रियल-टाइम डेटा

(B) योजनाएँ एवं कार्यक्रम -

  1. मुख्यमंत्री बाढ़ राहत सहायता योजना
  2. Direct Benefit Transfer (DBT)
  3. आपदा के तुरंत बाद राहत
  4. जल-जीवन-हरियाली अभियान
  5. जल संरक्षण
  6. बाढ़ जल का पुनः उपयोग
  7. सूखा-बाढ़ दोनों से निपटने की रणनीति
  8. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
  9. Flood water harvesting
  10. Micro-irrigation
  11. नमामि गंगे कार्यक्रम
  12. गाद प्रबंधन
  13. फ्लड प्लेन रिस्टोरेशन

5. आधुनिक समाधान : Exam-Ready Points

(क) Structural + Non-Structural Mix

तटबंध + Flood zoning

River space concept (Make room for river)

(ख) Flood Ecology Approach -

मखाना

सिंघाड़ा

मत्स्य पालन

Wetland economy

(ग) नेपाल सहयोग -

Joint River Commission

Catchment Area Treatment

Shared Early Warning System

 6. स्थायी समाधान : प्रस्ताव (Enrichment हेतु)

नेपाल सीमा के समानांतर

20–25 मी. चौड़ा

5–10 मी. गहरा जलाशय

उपयोग:

Flood moderation

Fisheries

Border Super Highway

👉 उत्तर में इसे “Multi-Purpose Flood Corridor Model” कहकर प्रस्तुत किया जा सकता है।

 7. निष्कर्ष (Model Conclusion)

बिहार में बाढ़ न तो पूर्णतः प्राकृतिक है और न ही पूर्णतः मानव-निर्मित।

समाधान भी केवल तटबंध या राहत नहीं, बल्कि समग्र नदी-बेसिन प्रबंधन, नेपाल सहयोग, इकोलॉजिकल अप्रोच एवं तकनीक आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली में निहित है।

बाढ़ को आपदा नहीं बल्कि संसाधन में बदलने की दिशा में सोच विकसित करनी होगी।

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बिहार : बाढ़ एवं सूखा

बाढ एक एसी प्राकृतिक आपदा है जिससे विहार सर्वाधिक प्रभावित होता है। बिहार में प्रत्येक वर्ष बाद अवश्य आती है, जो अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर डालती है। भारत के संदर्भ में बिहार का प्राकृतिक उच्चावच, अपवाह तंत्र के साथ नदियों का जलग्रहण क्षेत्र तथा मानसूनी वर्षा की प्राप्ति ऐसी है कि बाढ़ से बच पाना लगभग असंभव है। ‘राष्ट्रीय बाद आयोग’ के अनुसार देश का सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त राज्य बिहार ही है। यहाँ के 38 जिलों में 33 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं तथा पूरे बिहार के क्षेत्रफल का लगभग 73% बाढ्ग्रस्त है। उत्तरी बिहार के जिले बाढ़ से मुख्य रूप से प्रभावित हैं; जिनमें सारण, वैशाली, गोपालगंज, दरभंगा, मधुबनी, पूर्णियाँ, सहरसा, कटिहार, खगड़िया, बेगूसराय मुख्य हैं। उत्तरी बिहार की नदियाँ घाघरा, बागमती, कोसी, कमलाबलान, महानंदा प्रत्येक वर्ष बाढ़ लाती हैं। दक्षिण बिहार में पटना, जहानाबाद जिले भी बाढ़ से प्रभावित होते हैं।

बिहार में बाढ़ आने के कारण :

1. हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का जलग्रहण क्षेत्र वृहद् है, जिसमें अपार जल राशि का जमाव हो जाता है।

2. कम समय में अधिक वर्षा के कारण जलराशि काफी बढ़ जाती है।

3. उत्तरी बिहार की सभी नदियाँ गंगा में मिलती हैं। वर्षा के समय गंगा का जलस्तर काफी ऊँचा रहता है। अतः सहायक नदियों का जल गंगा में प्रवाहित नहीं हो पाता। नतीजतन नदियों का जल क्षैतिज रूप से फैलकर बाढ़ लाता है।

4. अवसादों के निक्षेप के कारण अधिकांश नदियों का तल उथला हो गया है।

5. उत्तरी बिहार की नदियों में मार्ग परिवर्तन के कारण भी बाढ़ आती है।

6. हिमालय तथा दक्षिणी पठार के बीच गंगा-बेसिन की बनावट ऐसी है कि यहाँ से शीघ्र जल निकासी संभव नहीं हो पाता, जबकि उत्तर व दक्षिण से आने वाली नदियाँ अपने जल को इसी बेसिन में जमा करती हैं।

7. मैदानी भागों का भौम जलस्तर काफी ऊँचा है। इस कारण भूमि में जलस्राव कम होता है, जिससे धरातलीय जल लम्बे समय तक जमा रहता है।

8. तटबंधों के निर्माण के कारण भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है। 1954 में बिहार में 160 कि॰मी॰ लम्बे तटबंध थे और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रफल 25 लाख हे. था। वर्त्तमान में 3430 कि॰मी॰ लम्बे तटबंध है, जबकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बढ़कर 68 लाख हे हो गया है।

9. तटबंधों के टूटने से भी अचानक बाढ़ आती है।

10. दो नदियों पर तटबंध बनने के बीच का 50-100 कि॰मी॰ क्षेत्र, जो कटोरानुमा आकार धारण कर लेता है, इनमें पानी भरने के बाद पानी का निकलना मुश्किल हो जाता है। फलतः बाढ़ की अवधि लंबी हो जाती है।

रोकथाम के प्रयास :-

बाढ़ एक प्राक्तिक आपदा है। इसे शत-प्रतिशत रोकना असंभव है। परंतु इससे होने वाली हानि को रोकने एवं बाढ़ का प्रभाव कम करने के उपाय किए जाते रहे हैं। 1954 में ‘राष्ट्रीय बाढ़ नीति’ लायी गयी। इसके तहत तटबंधों का निर्माण किया गया। हालाँकि तटबंध बाढ़ को रोकने में बहुत सहायक नहीं हो सके। वानिकी, मृदा अपरदन को रोकना आदि कार्यक्रम भी किए जा रहे हैं।

बाढ़ से निपटने के लिए वृहत प्रयासों की आवश्यकता है, जो निम्न रूपों में हो सकते हैं:-

1. जलग्रहपा क्षेत्र कार्यक्रम (Catchment Area Programme): इसके लिए नेपाल सरकार से सहयोग लेना चाहिए। इसमें बोंडंग (Bunding), वनीकरण, समोच्च कषि (Contour Farming) महत्त्वपूर्ण है।

2. नदियों से गाद/अवसाद हटाना आवश्यक है।

3. लघु नदी घाटी योजनाएँ बनाना ।

4. अपवाह चैनल (Drainage Channel) योजना बनाना चाहिए ताकि बल एकत्रित न होकर अलग गागों में विभक्त हो सके।

5. बाढ़ भविष्यवाणी को सुचारू रूप से स्थापित करना।

6. फ्लड इकोलोजी विकसित करना चाहिए जिसमें मत्स्य पालन, मखाना, सिंघाड़ा एवं अन्ग जलीय कृषि है।

7. मकान ऐसे बनाए जाएँ जो बाढ़ को सह सकें।

बाढ़ से बचने के लिए एक स्थायी उपाय आवश्यक है। विशेषज्ञों तथा जेएनयू के प्राक्कल के द्वारा एक प्रस्ताव दिया गया है, जो बाढ़ रोकने का एक स्थायी उपाय हो सकता है। प्रस्ताव के अनुसार नेपाल से समझौता कर बिहार-नेपाल को सीमा के साथ-साथ 20 से 25 मी. चौड़ा तथा 5-10 मो० गहरा जलाशय का निर्माण किया जाए। उत्तर से आने वाली नदियों का जल इसमें आकर बल का पूर्ण नियमन किया जाए। जलाशय का उपयोग मत्स्य पालन हेतु करना चाहिए एवं जलाशय के ऊपर सुपर हाइवे सड़क का निर्माण सीमा के साथ कर दिया जाए। इससे बिहार बाढ़ से मुक्त हो सकता है एवं अन्य विकासात्मक कार्य भी संभव हो सकेंगे।

 

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बिहार : बाढ़ एवं सूखा – एक भौगोलिक-प्रशासनिक चुनौती

(BPSC मेन्स – मॉडल उत्तर | लगभग 500 शब्द)

बिहार भारत का वह राज्य है जहाँ बाढ़ और सूखा दोनों का सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। एक ओर राज्य का लगभग 73 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़-प्रभावित है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण बिहार के कई जिले नियमित रूप से सूखे की चपेट में रहते हैं। यह स्थिति बिहार को आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाती है। बाढ़ यहाँ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि भौगोलिक संरचना, जल-प्रबंधन की कमजोर नीतियों तथा मानवीय हस्तक्षेपों का परिणाम भी है।

बिहार में बाढ़ के कारण

बिहार में बाढ़ का प्रमुख कारण हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ हैं, जिनका जलग्रहण क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। मानसून के दौरान नेपाल एवं हिमालयी क्षेत्रों में अल्प समय में अत्यधिक वर्षा होती है, जिससे नदियों में जलराशि तीव्रता से बढ़ जाती है। उत्तरी बिहार की लगभग सभी नदियाँ—जैसे कोसी, गंडक, बागमती, कमला-बालान एवं महानंदा—गंगा में मिलती हैं। वर्षा ऋतु में गंगा का जलस्तर ऊँचा होने के कारण सहायक नदियों का जल प्रवाह बाधित हो जाता है और जल क्षैतिज रूप से फैलकर बाढ़ का रूप ले लेता है।

इसके अतिरिक्त, हिमालय से आने वाली नदियों में भारी मात्रा में अवसाद (गाद) का निक्षेप होता है, जिससे नदी तल उथला हो गया है। मार्ग परिवर्तन की प्रवृत्ति, उच्च भौम जलस्तर तथा गंगा बेसिन की कटोरानुमा संरचना जल निकासी को और जटिल बना देती है। मानवजनित कारणों में अवैज्ञानिक तटबंध निर्माण, बाढ़ मैदानों में अतिक्रमण तथा नदी-तंत्र के साथ छेड़छाड़ प्रमुख हैं। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि तटबंधों की लंबाई बढ़ने के बावजूद बाढ़-प्रभावित क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है, जो नीति की सीमाओं को दर्शाता है।

बाढ़ के प्रभाव

बाढ़ का प्रभाव कृषि, परिवहन, स्वास्थ्य एवं सामाजिक संरचना पर व्यापक रूप से पड़ता है। फसलों की क्षति, पशुधन हानि, संक्रामक रोगों का प्रसार तथा बड़े पैमाने पर मौसमी पलायन बिहार की अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है। साथ ही, बार-बार की बाढ़ गरीबी के दुष्चक्र को और गहरा करती है।

रोकथाम एवं प्रबंधन के प्रयास

बाढ़ को पूर्णतः रोकना संभव नहीं है, किंतु इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। बिहार सरकार द्वारा आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, राहत सहायता योजनाएँ तथा जल संरक्षण आधारित अभियानों की शुरुआत की गई है। “जल-जीवन-हरियाली अभियान” के माध्यम से वर्षाजल संचयन और जल-संतुलन पर बल दिया गया है। साथ ही, नदी घाटी विकास, जलग्रहण क्षेत्र उपचार, वनीकरण, गाद प्रबंधन तथा गैर-संरचनात्मक उपायों जैसे बाढ़ पूर्वानुमान और समुदाय आधारित तैयारी को महत्व दिया जा रहा है।

विशेषज्ञों द्वारा सुझाया गया नेपाल के साथ समन्वय आधारित दीर्घकालिक समाधान—जैसे सीमावर्ती जलाशय एवं साझा नदी प्रबंधन—बाढ़ नियंत्रण की दिशा में स्थायी उपाय हो सकता है।

निष्कर्ष

अतः बिहार की बाढ़ समस्या का समाधान केवल तटबंधों या राहत कार्यों तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए समग्र नदी-बेसिन प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, पारिस्थितिक दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक जल-प्रबंधन आवश्यक है। बाढ़ को आपदा के साथ-साथ संसाधन के रूप में देखने की दृष्टि विकसित कर ही बिहार सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

 

 

 

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