BPSC AEDO & Bihar SI Full Test Discussion Start from 3rd November 2025 . Total Set Discussion- 50+50. BPSC 72nd, UPPSC 2026, MPPSC 2026, Mains Cum Pt Batch Start from 10 November 2025

BPSC 71st Mains Writing, Special Topics-2

By - Gurumantra Civil Class

At - 2025-12-24 15:36:37

भारत का बैलेंसिंग एक्ट : रूस के साथ परंपरा एवं अमेरिका के साथ साझेदारी

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

प्रश्न 1 (समग्र विश्लेषणात्मक)

“भारत की विदेश नीति में रूस के साथ ऐतिहासिक रणनीतिक संबंध और अमेरिका के साथ उभरती साझेदारी, ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत को किस प्रकार प्रतिबिंबित करती है?”

(ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान वैश्विक संदर्भ एवं भविष्य की चुनौतियों के आलोक में विवेचना कीजिए।)

प्रश्न 2 (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आधारित)

भारत–रूस तथा भारत–संयुक्त राज्य अमेरिका संबंधों के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिए।

(बताइए कि शीत युद्ध एवं उत्तर-शीत युद्ध काल ने इन संबंधों को कैसे प्रभावित किया।)

प्रश्न 3 (महत्व आधारित)

भारत के लिए रूस एवं अमेरिका दोनों के साथ संबंध बनाए रखना क्यों आवश्यक है?

(उत्तर में रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, Indo-Pacific तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ को शामिल कीजिए।)

प्रश्न 4 (समसामयिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति)

. रूस–यूक्रेन युद्ध एवं अमेरिका–रूस तनाव के संदर्भ में भारत की भूमिका का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

(क्या भारत की तटस्थता वास्तव में ‘सक्रिय संतुलन’ (Active Balancing) का उदाहरण है?)

प्रश्न 5 (नीतिगत दुविधा)

अमेरिका द्वारा दबाव एवं चेतावनी (CAATSA जैसे प्रावधानों) के बावजूद भारत द्वारा रूस से ऊर्जा एवं रक्षा सहयोग बनाए रखने के निर्णय को कैसे समझा जा सकता है?

(इसे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।)

प्रश्न 6 (राजनीतिक आयाम)

अमेरिकी आपत्तियों के बाद भी रूस के साथ भारत के संबंधों में क्या कोई गुणात्मक परिवर्तन आया है?

(उत्तर में भारत की प्रतिक्रिया, कूटनीतिक भाषा एवं नए राजनीतिक संकेतों का विश्लेषण कीजिए।)

प्रश्न 7 (रणनीतिक स्वायत्तता)

“भारत न तो किसी गुट का हिस्सा है और न ही तटस्थ दर्शक।”

(इस कथन को भारत के अमेरिका एवं रूस दोनों के साथ संबंधों के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।)

प्रश्न 8 (निर्णय एवं भविष्य की दिशा)

वर्तमान वैश्विक ध्रुवीकरण (Polarisation) के दौर में भारत के लिए कौन-से रणनीतिक निर्णय एवं कदम आवश्यक हैं?

(उत्तर में रक्षा विविधीकरण, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन एवं बहुपक्षीय मंचों की भूमिका पर चर्चा कीजिए।)

प्रश्न 9. (नैतिक बनाम राष्ट्रीय हित)

भारत की विदेश नीति में नैतिक आदर्शों एवं राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन किस प्रकार साधा जाता है?

(इसे रूस–अमेरिका विवाद के संदर्भ में उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।)

प्रश्न 10. (BPSC / UPSC शैली – समसामयिक)

क्या भारत का ‘बैलेंसिंग एक्ट’ दीर्घकाल में उसे एक विश्वसनीय वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा?आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।

भारत की विदेश नीति का केंद्रीय तत्व रणनीतिक स्वायत्तता रहा है, जिसके अंतर्गत वह किसी एक शक्ति-गुट से बंधने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाता है। रूस के साथ ऐतिहासिक परंपरा और अमेरिका के साथ उभरती रणनीतिक साझेदारी इसी “बैलेंसिंग एक्ट” का स्पष्ट उदाहरण है।

शीत युद्ध काल में भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, किंतु व्यवहार में उसके संबंध तत्कालीन सोवियत संघ (वर्तमान रूस) के साथ अधिक घनिष्ठ रहे। 1971 की भारत–सोवियत मैत्री संधि ने भारत को रणनीतिक सुरक्षा प्रदान की, विशेषकर 1971 के युद्ध के समय। रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा सहयोग ने इस साझेदारी को मजबूत किया।इसके विपरीत, उसी काल में संयुक्त राज्य अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहा, जिससे भारत–अमेरिका संबंध सीमित बने रहे। हालांकि 1991 के बाद शीत युद्ध की समाप्ति, आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के साथ भारत–अमेरिका संबंधों में उल्लेखनीय सुधार हुआ। 2005 का असैन्य परमाणु समझौता इस बदलाव का प्रतीक बना।

भारत–रूस एवं भारत–अमेरिका संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

(क) भारत–रूस संबंध : परंपरा की नींव

शीत युद्ध काल में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, परंतु रणनीतिक दृष्टि से भारत के संबंध सोवियत संघ (वर्तमान रूस) के साथ अधिक निकट रहे।

  • 1971 की भारत–सोवियत मैत्री संधि ने भारत को राजनीतिक, कूटनीतिक एवं सैन्य सुरक्षा प्रदान की।
  • रक्षा क्षेत्र में MIG विमान, टैंक, पनडुब्बी, परमाणु ऊर्जा सहयोग ने संबंधों को गहराई दी।
  • रूस ने संयुक्त राष्ट्र में कई बार भारत के हितों (विशेषकर कश्मीर) का समर्थन किया।

(ख) भारत–अमेरिका संबंध : दूरी से साझेदारी तक

शीत युद्ध काल में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंध सीमित रहे; अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर था।

  • 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण एवं शीत युद्ध की समाप्ति से संबंधों में सुधार हुआ।
  • 2005 का भारत–अमेरिका परमाणु समझौता संबंधों में टर्निंग पॉइंट बना।
  • 21वीं सदी में Indo-Pacific, चीन की चुनौती और तकनीकी सहयोग ने रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया।

भारत के लिए अमेरिका एवं रूस के साथ संबंधों का महत्व

(क) रूस का महत्व

  • रक्षा सहयोग: भारत के लगभग 60–70% रक्षा उपकरण रूसी मूल के रहे हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: तेल, गैस एवं परमाणु ऊर्जा में रूस दीर्घकालिक साझेदार।
  • रणनीतिक भरोसा: रूस भारत की संप्रभुता एवं सुरक्षा चिंताओं के प्रति अपेक्षाकृत संवेदनशील रहा है।
  • बहुध्रुवीय विश्व: रूस भारत को पश्चिमी वर्चस्व के संतुलन में सहयोगी मानता है।

(ख) अमेरिका का महत्व

  • तकनीक एवं निवेश: IT, AI, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रौद्योगिकी में सहयोग।
  • Indo-Pacific रणनीति: चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में साझेदारी।
  • वैश्विक मंच: G20, QUAD, WTO में भारत की भूमिका को समर्थन।
  • डायस्पोरा एवं व्यापार: अमेरिका भारत का बड़ा व्यापारिक एवं निवेश साझेदार।

अमेरिका–रूस विवाद के वर्तमान संदर्भ में भारत की भूमिका

रूस–यूक्रेन युद्ध (2022– )

युद्ध के बाद अमेरिका एवं पश्चिमी देश रूस के विरुद्ध प्रतिबंधों की नीति पर चले गए।

भारत ने युद्ध में किसी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया, बल्कि संवाद और कूटनीति पर बल दिया।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कई प्रस्तावों पर Abstention अपनाया — इसे “तटस्थता” नहीं बल्कि रणनीतिक संतुलन माना गया।

👉 भारत की भूमिका:

Voice of Global South के रूप में शांति, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा स्थिरता पर जोर

मानवीय सहायता, निकासी अभियान (Operation Ganga)

युद्ध को वैश्विक दक्षिण की अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखना

 

अमेरिका द्वारा मना करने के बाद रूस के प्रति भारत की प्रतिक्रिया एवं नया राजनीतिक आयाम-

(क) अमेरिकी दबाव

अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीद, S-400 मिसाइल प्रणाली आदि पर आपत्ति जताई।

CAATSA के तहत प्रतिबंधों की आशंका व्यक्त की गई।

(ख) भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, किसी बाहरी दबाव पर नहीं।

ऊर्जा संकट के समय रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत की आर्थिक मजबूरी और नीति दोनों है।

भारत ने अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखा, टकराव नहीं बढ़ाया।

(ग) नया राजनीतिक आयाम

Multi-alignment की नीति और स्पष्ट हुई

भारत न तो रूस का “camp follower” बना, न अमेरिका का “ally”

भारत एक स्वतंत्र शक्ति (Autonomous Power) के रूप में उभरा

 

भारत के लिए आवश्यक निर्णय एवं रणनीतिक कदम

(1) रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखना -

Non-Alignment से आगे बढ़कर Strategic Autonomy + Issue-based Alignment

(2) रक्षा विविधीकरण -

रूस पर निर्भरता घटाते हुए स्वदेशीकरण (Atmanirbhar Bharat)

अमेरिका, फ्रांस, इज़राइल के साथ संतुलित रक्षा सहयोग

(3) ऊर्जा सुरक्षा -

रूस, पश्चिम एशिया, नवीकरणीय ऊर्जा — तीनों पर समान फोकस

(4) कूटनीतिक संतुलन -

BRICS, SCO के साथ-साथ QUAD, G20 में सक्रिय भूमिका

किसी भी गुट में फँसने से बचाव

(5) वैश्विक नेतृत्व -

“Bridge Power” के रूप में उभरना

Global South की आवाज़ बनना

 

दोनों संबंधों का भारत के लिए महत्व

रूस भारत का दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार रहा है। रक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी निर्भरता रूसी उपकरणों पर रही है, साथ ही ऊर्जा सुरक्षा (तेल, गैस, परमाणु ऊर्जा) में रूस की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। रूस बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक है, जो भारत की वैश्विक दृष्टि से मेल खाती है।

वहीं अमेरिका भारत के लिए प्रौद्योगिकी, निवेश, नवाचार और Indo-Pacific क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग का प्रमुख स्रोत है। चीन के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में अमेरिका के साथ साझेदारी भारत की समुद्री सुरक्षा और वैश्विक भूमिका को सुदृढ़ करती है।

अमेरिका–रूस विवाद में भारत की भूमिका

रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए। इस संदर्भ में भारत ने किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद, कूटनीति और शांति पर जोर दिया। संयुक्त राष्ट्र में भारत की abstention नीति को निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि सक्रिय संतुलन (Active Balancing) के रूप में देखा गया। भारत ने वैश्विक दक्षिण के हितों—खाद्य, ऊर्जा और विकास—को प्राथमिकता दी।

अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद रूस से संबंध

अमेरिका द्वारा रूसी तेल आयात और S-400 जैसे रक्षा सौदों पर आपत्ति जताने के बावजूद भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भारत ने रूस के साथ सहयोग जारी रखा, साथ ही अमेरिका के साथ संवाद और साझेदारी को भी बनाए रखा। इससे भारत की multi-alignment नीति और अधिक स्पष्ट हुई।

निष्कर्ष

भारत का बैलेंसिंग एक्ट यह दर्शाता है कि वह न तो किसी शक्ति का अनुयायी है और न ही अलग-थलग रहने वाला देश। रूस के साथ परंपरागत भरोसा और अमेरिका के साथ आधुनिक साझेदारी—दोनों को संतुलित करते हुए भारत एक स्वतंत्र, विश्वसनीय और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में सामने आता है। वर्तमान ध्रुवीकृत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यही संतुलन भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत है।

भारत का बैलेंसिंग एक्ट उसकी विदेश नीति की परिपक्वता, आत्मविश्वास और व्यावहारिकता को दर्शाता है।रूस के साथ ऐतिहासिक भरोसा और अमेरिका के साथ आधुनिक साझेदारी—दोनों को संतुलित करना आज भारत की आवश्यकता ही नहीं, बल्कि उसकी वैश्विक भूमिका की पहचान बन चुका है।वर्तमान ध्रुवीकृत विश्व में भारत का यह दृष्टिकोण उसे एक विश्वसनीय, स्वतंत्र और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।

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