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चंपारण सत्याग्रह

By - Gurumantra Civil Class

At - 2024-07-18 21:23:44

चम्पारण सत्याग्रह

"हो सकता है कि महात्मा गाँधी के सत्याग्रह का पहला प्रयोग बिहार के चंपारण में किया जाना मात्र एक संयोग ही हों, किन्तु उससे जो सफलता मिली तथा सम्पूर्ण देश को उसने जो एक आदर्श प्रस्तुत किया, उसका ही महत्व सर्वाधिक है।"

महात्मा गाँधी ने भारत में सत्याग्रह का प्रथम प्रयोग 1917 ई में चंपारण में किया जो चम्पारण सत्यापह के नाम से जाना जाता है। यह राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख घटना थी क्योंकि इस आन्दोलन के दौरान गाँधी जी ने जिन तरीकों का प्रयोग किया था उसका बाद के सभी आन्दोलनों में उपयोग किया गया। इसी आन्दोलन के साथ गाँधीजी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गए।

चम्पारण क्षेत्र में अंग्रेज भूमिपतियों के द्वारा किसानों का निर्मम शोषण लम्बे समय से होता आ रहा था। 19वीं सदी के आरम्भ में गोरे बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया जिसके तहत किसानों को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ही 'तिनकठिया पद्धति' कहा जाता है। न तो किसानों को उचित मजदूरी मिलती थी और न ही नील की खेती भूमि के लिए ही अनुकूल थी। जो किसान नील की खेती करने से मुक्ति चाहते थे उन पर मनमाने ढंग से लगान बढ़ा दिया जाता था। इस उत्पीड़न और शोषण के कारण किसानों की आर्थिक दशा सोचनीय हो गई थी। प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका भी किसानों के विरुद्ध जमींदारों के साथ ही खड़ी थी। बिहार के समाचारपत्रों विशेषकर 'बिहारी' ने समाचारों के माध्यम से नीलहों के अत्याचार को जनता के समक्ष रखा।

1916 ई में कांग्रेस का 31वाँ अधिवेशन लखनऊ में हुआ जिसमें बिहार से काफी संख्या में प्रतिनिधि शामिल हुए। यहाँ चम्पारण के नीलवरों एवं उनके साथ रैयतों के सम्बन्ध की जाँच के विषय में प्रस्ताव पारित हुए। इस अधिवेशन में चम्पारण के राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी से मुलाकात कर चम्पारण के किसानों की दयनीय स्थिति एवं अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी उन्हें सुनाई और उनसे चम्पारण आकर स्थिति का अध्ययन करने का अनुरोध किया। शुक्ल जी के अनुरोध पर गाँधी जी अप्रैल 1917 को पटना पहुँचे ।। अप्रैल को गाँधीजी ने बिहार प्लैन्टर्स एशोसिएशन के मंत्री जे० एम० विल्सन से मुजफ्फरपुरर में मुलाकात कर अपने आने का कारण बताया। परन्तु विल्सन ने किसी भी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया। तब वे तिरहुत डिवीजन के कमीश्नर मि० मौशेंड से मिले। मौशेंड का मानना था कि किसी प्रकार की जाँच की जरूरत नहीं है। इसके बाद गाँधी जी मोतिहारी के लिए प्रस्थान किए। उन्हें चम्पारण छोड़ने का आदेश मिला जिसे उन्होंने मानने से इंकार कर दिया। गाँधीजी पर मुकदमा चलाया गया लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया। गाँधीजी को चम्पारण के गाँवों में जाने की छूट दे दी गई। सरकारी आदेश की अवहेलना तो बड़ी घटना थी ही, गाँधी जी के सामने सरकार का झुकना इससे भी बड़ी घटना थी।

गाँधीजी अपने सहयोगियों ब्रजकिशोर प्रसाद, राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, नरहरि पारिख, आचार्य कृपलानी, अनुग्रह नारायण तथा अन्य बुद्धिजीवियों के साथ सुबह गाँवों में निकल जाते और दिनभर घूम-घूमकर किसानों का बयान दर्ज करते। उधर बिहार प्लेन्टर्स एशोसिएशन ने गाँधी के जाँच पर अपना विरोध प्रकट किया तथा इस सम्बन्ध में एक प्रस्ताव कमिश्नर के सामने भेजा। गाँधी जी और उनके सहयोगियों की सक्रियता और वहाँ के किसानों का उत्साह देखकर सरकारी व्यवस्था असमंजस में पड़ गई। उच्च अधिकारियों और खासकर लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड गेट ने स्थिति को और अधिक नहीं बिगड़ने देने की तत्परता दिखलाई और समस्या के हल की तलाश में रचनात्मक कदम उठाया। एडवर्ड गेट ने गाँधी जी को वार्ता के लिए बुलाया और किसानों के करों की जाँच के लिए एक समिति के गठन का प्रस्ताव रखा जो चम्पारण कृषि समिति कहलायी। इस जाँच समिति के अध्यक्ष एफ० जी० स्लाई थे। गाँधी जी को भी इस समिति का सदस्य बनाया गया। पाँच सदस्यीय इस समिति में राजा हरिहर प्रसाद नारायण सिंह भी थे। 4 अक्टूबर 1917 को इस समिति ने अपनी सिफारिश प्रस्तुत की। इसमें कहा गया था कि बढ़े हुए लगान का 1/4 हिस्सा छोड़ दिया जाए तथा बाकी 3/4 भाग ही वसूला जाए। नगद वसूली गई राशि में से 25% वापस कर दिया जाए। शेष रुपया रैवत छोड़ दे। सिफारिश में तीन कठिया प्रणाली को समाप्त करने की भी बात कही गई थी। इस प्रकार गाँधी जी ने किसानों को राहत के लिए एक महत्त्वपूर्ण सफलता हासिल की। फलतः कहा जा सकता है कि आन्दोलन पूर्ण सफल रहा और बिहार की धरती पर किया गया महात्मा गाँधी का पहला प्रयोग भी सफल रहा।इस आन्दोलन में पहली बार किसी भारतीय नेता ने ब्रिटिश अधिकारियों का आदेश मानने से इंकार कर कानून तोड़ने के एवज में दंड पाना मुनासिब समझा। जबकि इसके पहले के नेता यथा-तिलक, एनी बेसेन्ट आदि जन संघर्ष एवं विरोध के साथ-साथ निर्वासन का भी पालन करते थे। यही कारण था कि गरम दल के प्रसिद्ध नेता तिलक को गाँधी काफी उग्र नजर आये।चम्पारण सत्याग्रह में पहली बार किसानों की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया तथा समस्या के समाधान हेतु पहली बार किसी राष्ट्रीय नेता ने किसानों का साथ दिया। इस आन्दोलन की आशिक सफलता ने किसानों का उत्साह बढ़ाया और अनेक किसान आन्दोलन शुरू हुए जैसे-खेड़ा आन्दोलन, अवध आन्दोलन। गाँधी जी द्वारा ब्रिटिश सरकार के कानून का शांतिपूर्ण ढंग से विरोध इस आन्दोलन की प्रमुख विशेषता बन गई।

आलोचना :- कुछ आलोचकों का कहना है कि गाँधी जी ने लगान की शत-प्रतिशत वापसी की माँग क्यों नहीं की । गाँधी जी का कहना था कि 25% रकम वापस करना भी बागान मालिकों के लिए बहुत बड़ी बेइज्जती थी। इससे वे अत्यधिक शर्मिन्दा होते। यद्यपि किसानों के करों के निवारण के लिए ये उपाय अपर्याप्त थे फिर भी पहली बार शांतिपूर्ण जनविरोध के माध्यम से सरकार को कुछ माँगों को स्वीकार कर लेने पर सहमत कर लेना एक बड़ी उपलब्धि थी। सत्याग्रह, का यह पहला प्रयोग इस दृष्टिकोण से अत्यन्त सफल रहा। गाँधी आन्दोलन में चम्पारण आन्दोलन प्रथम सोपान था। इस आन्दोलन के क्रम में जो नेता गाँधीजी से जुड़े वे जीवन पर्यन्त उनके साथ रहे। इस आन्दोलन द्वारा गाँधी जी ने बिहार वासियों को सत्याग्रह और अहिंसा की जो सीख दी उसका उन्होंने आगामी सभी आन्दोलनों में पालन किया। फलस्वरूप 1919 से 1944 ई के बीच गाँधी जी ने छ: बार अहिंसात्मक आन्दोलन किए जिसमें बिहार की भूमिका अहम रही।

विगत वर्षों में पूछे गए प्रश्न

1. चम्पारण सत्याग्रह स्वाधीनता संघर्ष का निर्णायक मोड़ था। स्पष्ट कीजिए (66वीं एवं 64 वीं, बी.पी.एस.सी.)

2 बिहार में चम्पारण सत्याग्रह के कारणों एवं परिणामों की वर्णन करें। (63वीं, बी.पी.एस.सी.)

3. किसान विद्राहों के लिए चम्पारण सत्याग्रह के महत्व को स्पष्ट कीजिए। (56-59वीं, बी.पी.एस.सी.)

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