उर्दू भाषा की उत्पत्ति का इतिहास: पूर्ण विवरण
By - Gurumantra Civil Class
At - 2026-01-10 09:03:00
उर्दू भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई?
- उर्दू भाषा का विकास भाषाई मिश्रण (linguistic synthesis) के माध्यम से हुआ।
- भारत में मध्यकाल (13वीं–18वीं शताब्दी) में तुर्क, अफ़ग़ान और मुग़ल शासकों का आगमन हुआ।
इन शासकों की भाषाएँ थीं—
- फ़ारसी, अरबी और तुर्की
- दूसरी ओर, स्थानीय जनता बोलती थी— खड़ी बोली (अपभ्रंश से विकसित)
👉 जब विदेशी सैनिक, प्रशासक और स्थानीय लोग आपस में संपर्क में आए, तो आपसी संवाद के लिए एक सरल, मिश्रित भाषा विकसित हुई।
- व्याकरण और ढाँचा → खड़ी बोली
- शब्दावली → फ़ारसी, अरबी, तुर्की
- लिपि → फ़ारसी-अरबी (नस्तालिक़)
- यही भाषा आगे चलकर उर्दू कहलायी।
2. उर्दू भाषा की उत्पत्ति क्यों हुई?
उर्दू के विकास के पीछे कई व्यावहारिक और सामाजिक कारण थे—
(क) संचार की आवश्यकता-
- सेना, दरबार, बाजार और प्रशासन में
- अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले लोग थे
- आपसी संवाद के लिए साझा भाषा की जरूरत थी
(ख) सैन्य शिविरों की भूमिका -
- “उर्दू” शब्द का मूल तुर्की शब्द “ओरदु / Ordu” है
- जिसका अर्थ है— सेना या छावनी
- सैनिक शिविरों में विकसित होने के कारण इसे पहले “ज़बान-ए-उर्दू-ए-मुअल्ला” कहा गया ।
(ग) सांस्कृतिक समन्वय -
- भारतीय लोक परंपरा + इस्लामी-फ़ारसी संस्कृति
- संगीत, कविता, सूफ़ी विचारधारा ने भाषा को लोकप्रिय बनाया
3. उर्दू भाषा की उत्पत्ति कहाँ हुई?
(क) प्रारंभिक केंद्र -
- उर्दू का प्रारंभिक विकास उत्तरी भारत में हुआ
- विशेष रूप से दिल्ली को उर्दू का जन्मस्थल माना जाता है
(ख) दक्षिण भारत में विस्तार -
- दिल्ली सल्तनत के सैनिक जब दक्कन पहुँचे, तो वहाँ दकनी उर्दू का विकास हुआ
- गोलकुंडा, बीजापुर और अहमदनगर इसके प्रमुख केंद्र बने ।
(ग) साहित्यिक उत्कर्ष -
- मुग़ल काल में उर्दू दरबारी और साहित्यिक भाषा बनी ।
- 18वीं–19वीं सदी में दिल्ली और लखनऊ
- उर्दू साहित्य के प्रमुख केंद्र बने
4. उर्दू और हिंदी का संबंध (संक्षेप में)
दोनों की बोली का आधार एक ही है— खड़ी बोली
अंतर मुख्यतः—
- लिपि (उर्दू: फ़ारसी-अरबी | हिंदी: देवनागरी)
- शब्दावली (उर्दू: फ़ारसी-अरबी | हिंदी: संस्कृत)
निष्कर्ष
उर्दू भाषा—
किसी एक व्यक्ति या काल की देन नहीं, बल्कि ये मध्यकाल में भारत में होने वाले अरब तुर्क एवं मुगल विदेशी आक्रमण एवं उनके गुलामी शासन का परिणाम है ।
यह भाषा सैन्य शिविरों से निकलकर साहित्य, कविता और संस्कृति की भाषा बनी।